शनिवार, 1 जनवरी 2011

क्या जेपीसी आम जनता के लिए नहीं ?

साल के शुरु से ही या फिर यूपीए – 2 के समय से ही खाने पीने की वस्तुओं की कीमत में जिस तरह से दिन – दूनी रात चौगुनी तरक्की हो रही थी वह अभी भी कहीं न कही से अपना मुंह खोल लेती है। अभी तक तो जनता ने दूध चीनी दाल सब्जी पेट्रोल सबके दाम देखे है अब इसमें एक नया सदस्य भी शामिल हो गया है प्याज, अब प्याज ने उछाल मारा तो इसमें नया क्या है। कृषि मंत्री शरद पवार के अनुसार प्याज की फसल बारिश से खराब हुई है। लेकिन सरकारी आंकङे को देखकर तो यह बात गले नहीं उतर रही है। आंकङे के अनुसार चालू वित्त वर्ष मे अक्टूबर तक 10.27 लाख टन प्याज का निर्यात किया गया। पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में निर्यात 12.99 लाख टन था। चालू वित्त वर्ष में अभी तक प्याज की पैदावार 95 लाख टन है, जबकि पिछले वर्ष 85 लाख टन थी। साफ है कि उत्पादन बढने और निर्यात कम होने के बावजूद प्याज की कीमतो पर और उसकी कालाबाजारी पर काबू नही पाया जा सका। इतना अर्थशास्त्र तो मैं जानता हूं कि जब उत्पादन बढने पर वस्तु का मूल्य घटता है। लेकिन यह पहली बार देखा है कि उत्पादन बढने पर भी वस्तु का मूल्य एक – दो रुपया नही बल्की तिगुणा बढ गया। यह किस तरह का अर्थशास्त्र है ये हमारे माननीय प्रधानमंत्री ही बताऐगें क्योकि वे तो अर्थशास्त्र के विद्वान कहलाते है। गौर करने वाली बात है अठ्ठारहवीं सदी के 80 के दशक में अस्तित्व मे आई कांग्रेस और उसका 83 वां महाधिवेशन, 80 के दशक में जन्मी भारतीय जनता पार्टी और प्याज का दाम 80 रुपये किलो तक जाना। दरअसल, इस 8 के आंकङे ने एक ऐसे खतरनाक चौकङी को खङा कर दिया है, जिससे आम आदमी को आने वाले सालों में राहत मिलने कोई उम्मीद नजर नहीं आती दिख रही है। दल्ली में आयोजित कांग्रेस की 83 वें महाधिवेशन में एक बहुत खतरनाक, जनविरोधी और राजतंत्रशाही समर्थित मानसिकता का खाका निकलकर आया। महाधिवेशन में पारित किए गए आर्थिक प्रस्ताव से साबित हो गया कि केन्द्र में सत्तारुढ कांग्रेस आखिर आम आदमी के बारे क्या सोचती है। इस प्रस्ताव पर मंच से सभी नेताओं ने एक ही बात कही कि हम यानी केन्द्र पैसा देता है, लेकिन राज्य उसका उपयोग नही करते। इस वित्तीय वर्ष में केन्द्र ने राज्यों को 2.83 लाख करोङ रुपये दिये जाने का लक्ष्य है, लेकिन राज्यों ने अभी तक 95 हजार करोङ रुरयो का उपयोग गरीबों के लिए लक्ष्यत योजनाओं में नही किया है।

गौरतलब है कि यह केन्द्र यानी कांग्रेस नीत सत्तारुढ यूपीए की मनसिकता है कि वह तो खैरात बांट रही है, लेकिन गरीबों यह राहत राज्य सरकारों के कारण नहीं मिल पा रहा है। इसलिए अगर आम आमदी को खैरात पूरी चाहिए तो राज्यों की सरकारों को कांग्रेस के शासन से बदल दे।

पार्टी के महाधिवेशन में एक और खतरनाक तर्क दिया गया। मौजूदा गृहमंत्री और पूर्व वित्तमंत्री पी. चिदंबरम ने यह तर्क रखा कि एनडीए के शासनकाल में औसत विकास दर 5.8 फीसदी थी, जबकी कांग्रेस नीत यूपीए में छह साल के शासनकाल में यह दर 8.5 फीसदी रही। चिदंबरम के अनुसार 3 फीसदी के अंतर के कारण ही केन्द्र की यूपीए सरकार ने किसानों का 70000 करोङ रुपय का ऋण माफ कर सकी। इसी तीन फीसदी के कारण 40000 करोङ रुपये की मनरेगा योजना चल सकी। प्रधानमंत्री ग्राम सङक योजना में 12000 करोङ रुपये रख सकी। सर्व शिक्षा अभियान, मिड – मिल में हजारों करोङों रुपये खर्च किए गए यानी विकास दर ज्यादा होगी तो गरीबों के उत्थान लिए काम किया जा सकेगा। नही तो नही। और विकास दर में बढोतरी वस्तुओं को मंहगा करके ही हो सकती है। लेकिन उन्होने और उनके साथियों ने यह नहीं बताया कि अगर सरकार ने अपना काम ढंग से करती तो 2जी स्पेक्ट्रम में ही उसे 1.76 लाख करोङ की आय होती, जो उस तीन फीसदी से कहीं ज्यादा है।

लेकिन हमारे प्रधानमंत्री ने यह एक बार नहीं कई बार कहा है कि वे मंहगाई जानबूझकर बढने दे रहै है। ऐसा नही किया तो देश की अर्थव्यवस्था ठप हो जाएगी, लोगों को रोजगार नहीं दिए जा सकेगें और गरीबों के उत्थान के लिए चलाई जा रही योजनाओं के लिए पैसा नही मिल सकेगा। प्रधानमंत्री ने यह बयान बीते बजट सत्र में राष्ट्रपति के अभिभाषण के दौरान दिया। साउदी अरब से लौटते हुए भी दिया और हाल ही में कनाडा में जी20 देशों के सम्मेलन के दौरान दिया। उनका कहना था कि देश के लोगों को संकीर्ण दायरे में रहकर नहीं सोचना चाहिए। लेकिन डेढ साल में सरकार की इस मंहगाई समर्थक नीति के कारण कितने लाख लोग काल के गाल में असमय ही समा गऐ। बीते एक साल में एक करोङ 36 लाख लोग गरीबी रेखा से नीचे चले गए है। यह हम नहीं यूएनडीईएसए की रिर्पोट कह रही है। इसका अंदाजा न सोनिया को है, न माननीय प्रधानमंत्री और न ही लालकृष्ण आडवाणी को।

यहां आडवाणीजी की बात इसलिए कर रहा हूं क्योकिं जून में जब पेट्रोल डीजल और रसोई गैस के दाम बढे तो राजग देशव्यापी बंद का आहवान किया था। बंद के तुरंत बाद आडवाणी जी के मुंह से हमेशा की तरह यही निकला कि बतौर विपक्ष हमने अपना कर्तव्य बखूबी निभाया और अब हम जनता के सामने अपना मुंहर लेकर जा सकेगें।

मंहगाई से आमआदमी पिछले डेढ साल से जूक्ष रहा है। लेकिन बतौर विपक्ष बीजेपी ने क्या किया। फरवरी 25 को संसद में धारा 193 के तहत बहस हुई, करीब आठ घंटे चली बहस के बाद अगले ही दिन वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने पेट्रोल डीजल और यूरिया के दाम बढा दिए। 27 अप्रैल को भाजपा औओर वामपंथीयो द्वारा सरकार के खिलाफ महंगाई पर कट मोशन लाया गया लेकिन ऐन मौके पर मुलायम, लालू, मायावती, शिबूसोरेन, अजीत सिंह, सब सरकार के साथ खङे दिखे।

जब जून में सरकार ने फिर से तेल रसोई गैस, केरोसिन के दाम बढाये तो जनता के मन का गुबार फुट पङा। नतीजतन 5 जुलाई को भारत बंद रहा यानी जब जनता सङक पर उतरी तो राजनीतिक दल बैकफुट पर आ गए। अगस्त में भाजपा द्वारा लाया जाने वाला स्थगन प्रस्ताव प्रणव मुखर्जी की एक चाय पार्टी के बाद संसद में एक आम बहस में तब्दील हो गया।

यहां पर बात यह उठती है कि विपक्ष तो 2जी स्पेक्ट्रम मामले में सरकार पर आंखे तरेती नजर आती है तो जेपीसी के मांग पर संसद का एक पूरा सत्र उसकी बलि चढा देती है, तो कभी महासंग्राम रैली करती दिखती है। लेकिन जब बात मंहगाई की आती है तो वह तत्परता विपक्ष में नहीं दिखता। मंहगाई के मामले में तो चाय की पार्टी में सुलह हो जाती है, लेकिन 2जी स्पेक्ट्रम मामले में हमारे वित्त मंत्री की चाय पार्टी काम न आई। इस मामले में तो भाजपा को माननीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की गर्दन दिख रही है।

सोमवार, 13 सितंबर 2010

समाजवादी या धनवादी

हमारे सांसदो ने अपने वेतन को बढाने के लिए जिस तरह दलगत भावना से उपर उठकर सदन के कार्यो को बधित किया। यह देखकर तो कहीं से ऐसा नहीं लग रहा था कि ये जनता के सेवक है। और अगर ये अपने को जनता के सेवक मानते है और संसद में इसलिए बैठे है कि जनता ने उन्हे वहां चुनकर भेजा है। तो जिस तरह ये अपने कर्मचारियों से तुलना कर अपनी तनख्वाह बढाने का तर्क दे रहे है बल्की बढा भी चुके है, तो उसी तरह से जनता की मांग है कि उसे भी उसके सेवक के बराबर सुविधा और वेतन उसे भी मिले। वह नौकरी में है या नही बिना इस बहस मे पङे उसे जनता होने और सरकार चुनने के इतने बङे काम के एवज में वेतन दिया जाना चाहिए। यहां जनता और सरकार आमने – सामने है। क्योंकि जनता और सरकार दो ऐसे सत्ता के केंन्द्र है जो वेतन नही मिलने पर भी अपनी जगह कायम रहने है। इनमें से एक ने जब अपना सारा ध्यान वेतन बढोतरी पर दिया है तो दूसरा सत्ता क्यों चुप रहें।

मामला तो दिलचस्प तब और हो जाता है जब इनके वेतन में मात्र तीन गुणा की बढोतरी होती है तो गरीब सांसदो के अगुवा बनकर उभरे समाजवादी नेता मुलायम सिह यादव ने बवाल खङा कर दिया। गौरतलब है कि संसदीय समिति ने सिफारिश की थी कि सांसदों का वेतन पांच गुणा बढना चाहिए तथा भारत सरकार के सचिव से एक रुपया ज्यादा हो क्योकि वरीयता क्रम में वे सचिव से उपर है। सांसद दलील देते है कि पूरे विश्व में वेतन सबसे कम है। उनका यह भी कहना है कि उन्हे बङे श्रेत्र की सेवा करनी पङती है और उनसे मिलने वालों में उनके श्रेत्र की जनता होती है। जिन्हे चाय पिलानी पङती है, बहुत भारी खर्च है उनपर, उनकी तनख्वाह में इजाफा तो होनी ही चाहिए। लेकिन इनका काम चाय पिलाना नहीं है । अपनी तमाम् जवाबदेहियों से मुँह मोङकर अगर उन्हे चाय पिलाने का इतना ही शौक है, तो अच्छा होगा की वे चाय की दुकान खोल ले।

आज भारतीय राजनीति पर कॉर्पोरेट संस्कति हावी हो गई है जो नेताओं की बङी कारों एवं डिजाइनर कपङों में देखी जा सकती है। 1975 में संविधान में संशोधन कर समाजवादी शब्द जोङा गया, किन्तु इनका समाजवाद की दिशा में बढने का कोई प्रयास कहीं से दिखता नहीं है। 1937 में जब नौ प्रांतो में कांग्रेस की सरकार बनी थी तो मंत्री ट्रेन की सबसे निचली – तृतीय श्रेणी यात्रा करते थे। और सांसद अपने को गरीब कहते है लेकिन उनकी संपत्ति की घोषणा से उनकी गरीबी का एहसास तो आम जनता को खूब होता है। यहां पर गौर करने वाली बात यह है कि जिस रफ्तार से उनकी संपत्ति बढती है यह देखकर कैसे मान लिया जाए की कम वेतन के कारण यह घाटे का धंधा है।

वेतन वृद्धि को लेकर सबसे मुखर लालू यादव थे। हजारों करोङ के चारा घोटाले को आरोपी है। बेहद गरीब परिवार से आते है। आज जो वैभव और संपत्ति उन्होने अर्जित किया है। वह इसी पेशे से किया है। और तो और कोई यह बता दे की कोई भी सांसद बनाने के बाद गरीब हुआ हो, उनकी संपत्ति तो दिन दुनी और रात चौगनी बढती है। गौरतलब है कि इनके वेतन बढने से कोई यह ना सोचे कि ये गलत तरीके से धन नहीं अर्जित करेंगे।

मंगलवार, 24 अगस्त 2010

इसे कहते है अंपायर

मैंदान वही , खिलाङी वही , विलेन कोई खिलाङी नही , वो तो अंपायर निकला।

मैं बात कर रहा हूं दांबुला मे खेला गये भारत श्रीलंका के बीच खेले गये मैच की। दांबुला के इस मैंच में कैप्टन कूल ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करने का फैसला किया। यह मैच श्रीलंका के हिसाब करो या मरो जैसा था क्योंकि अगर श्रीलंकाई टीम यह मैच हार जाती तो वह फाइनल से बाहर हो जाती। भारत के पास तो फिर भी अभी एक मौका है। लेकिन रविवार को जो भी हुआ उससे फिर एक बार सिंहलीयों पर खेल भावना के साथ खेलने पर उंगली उठने लगी है।

अभी भारत के साथ खेलते हुऐ पिछले मैच में सूरज रणदीव के द्वारा सहवाग को फेका गया नो बॉल विवाद थमा भी नही था कि श्रीलंकाई अंपायर धर्मसेना के द्वारा एक नया विवाद खङा कर दिया गया। धर्मसेना के द्वारा दिया गया फैसला कहीं न कहीं यह जरुर दर्शाता है कि वो अभी भी एक ईमानदार अंपायर कि भूमिका में नहीं है।

क्या धर्मसेना इस मैच में अंपायरिंग करने उतरे थे या फिर श्रीलंका के बारहवें खिलाङी के रुप में मैंदान पर आये थे। क्योंकि कही से यह लग ही नही रहा था कि वो अंपायरिंग कर रहे हो। रविवार के मैंच में उनकी अंपायरिंग देखकर तो ऐसा लग रहा था कि कहीं न कहीं उनके अन्दर अपनी टीम को फाइनल में पहुंचाने की ललक हो या फिर रणदीव – सहवाग विवाद का वो निकालना चाह रहे हो। खैर उनके दिमाग में कुछ भी चल रहा हो लेकिन इससे नुकसान किसे हो रहा है। गौरतलब है कि अगर बी.सी.सी.आई. आई.सी.सी से इस बारे में कुछ शिकायत करती है तो मैंच रिव्यू में जाऐगी। तो धर्मसेना को तलब भी किया जाऐगा हो सकता है कि अंपायर रेंटिग प्वांइट में उनके कुछ प्वांइट कट भी जाए। लेकिन इससे क्या उन्हे जो करना था वो तो कर गए। लेकिन इसका परिणाम क्या हुआ भारत इस सीरीज में भारत एक और शर्मनाक हार का स्वाद चखा। लेकिन इस पूरे विवाद ने एक सवाल जरुर खङा दिया है कि इससे नुकसान किसका हो रहा है। श्रीलंकाई टीम का नहीं मैंन – इन – ब्लू का नही। नुकसान तो हो रहा है इस जेन्टलमैन खेल का जिसे क्रिकेट कहते हैं।

मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

गुम होती फिरकी

क्रिकेट कि दुनिया मे एक से बढकर एक फिरकी गेंदबाज देने वाले देश भारत में आज फिरकी गेंदबाजों का आकाल पड़ चुका है। जिसने अपने फिरकी गेंदबाजों की बदौलत ही दुनिय़ा भर के दिगजो को धुल चटाया हुआ है। आज वही फिरकी लगभग दम तोड़ने की स्थिती से गुजर रहा है। इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कुंबले और हरभजन के अलवा कोई ऐस गेदबाज नही दिखता है जो अंतराष्टीय स्तर की गेंदबाजीं कर सके। कुंबले वैसे भी फटा-फटा क्रिकेट को अलविदा कह चुके है और ज्यादा से ज्यादा दो साल और अपने जौहर का कमाल दिखा पाएगें। अपने करीब 18 साल के करिअर और पचास हजार से ज्यादा गेंदें फेक चुके इस शानदार क्रिकेटर से अब उम्मीद नहीं करनी चाहिए। वैसे भी समीझको की माने तो भारतीय क्रिकेट के इतिहास में फिरकी गेंदबाजी कभी इतनी मुश्किल दौर से नहीं गुजरा है। यह समस्या कोइ रातों रात नहीं हुई। 90 के दशक तक घरेलु क्रिकेट में फिरकी गेंदबाजों का जलवा हुआ करता था। लेकिन 1995-96 में रणजी में फेंके गए कुल ओवरों का 66 प्रतिशत स्पिन गेंदबाजों नें फेंका इन्होने कुल गिरे विकेटों का 67 प्रतिशत आपस में बाँटे। लेकिन जब गांगुली और जान राइट भीरतीय क्रिकेट का काया पलट करने में लगे थे तो वे तेज गेंदबाजों को प्रोत्साहन और बेहतर प्रशिझण पर जोर दिया गया। नतीजा 2005-06 में तो घरेलु सत्र में सिफॅ 46 फीसदी ओवर ही स्पनरो के खाते में आया और वे 42 प्रतिशत विकेट ही चटका पाए।

गांगुली - राइट का यह प्रयोग बाद में द्रविड़-चैपल ने भी जारी रखा। 2000-01 से लेकर बांग्लादेश सीरीज तक टीम ने 72 टैस्ट मैच खेले इनमें से महज एक स्पिनर 34 मैचों मे कुंबले और हरभजन सिंह को एक साथ खेलने का मौका मिला। 28 टैस्ट मैंचो मे टीम महज एक स्पिनर के साथ मैदान में उतरी। ये कोइ छोटा-मोटा बदलाव नहीं हैं। यह उस बदलाव की झलक है जिस टीम के स्पिनरों की दुनिया में तुती बोलती थी।

अगर हम भारतीय स्पिन गेंदबाजी की बात करें तो इसे चार दौर में हम आसानी से अलग-अलग कर सकते हैं।

पहला दौर :-

1946 से 1960 का भारतीय क्रिकेट जो अभी अपने बचपन से गुजर रहा था। इस में बीनू मंनकंड जैसा आलराउण्डर मिला जो अपने स्पिन पर बल्लेबाजों को घुमाते थे ही साथ में बल्ले से भी जौहर दिखाते थे उन्हे लेग स्पिनर सुभाष गुप्ते और आफ स्पिनर गुलाम अहमद का साथ मिला।

दूसरा दौर :-

यह वह दौर था जब भारतीय फिरकी गेंदबाजों के सामने बड़े से बड़े बल्लेबाज पानी माँगते नजर आते थे यह दौर था प्रसन्ना भागवत चंद्रशेखर बिशन सिंह बेदी और वेंकट राघवन का जो की 1961 से 1982 तक रहा जिसे भारतीय फिरकी का स्वणॅ युग भी कहा जाता है। इस दौर में भारतीय टीम अकेली ऐसी टीम थी जो अपने स्पिनरों की बदौलत टेस्ट मैच जीतती थी। चंद्रशेखर और बेदी को तो फिरकी का जादूगर कहा जाता है। ये दोनो लेग स्पिनर तथा प्रसन्ना और राघवन ऑफ स्पिनर थे। बेदी प्रसन्ना और चंद्रशेखर की तिकड़ी के सामने बड़े से बड़ो ने घुटने टेक दिये थे।

तीसरा दौर :-

80 से 90 के दशक मे दिलीप दोषी, शिवलाल यादव और मनिंदर सिंह का रहा। ये भले ही उस उँचाइ को ना छू पाए लेकिन उस विरासत को आगे बढाया। इसी दौर में नरेंद्र हिरवानी और शिवरामकृष्णन आए लेकिन ये मैच जिताऊ नही बन पाए। हिरवानी ने अपने पहले टेस्ट में वेस्ट इंडीज के खिलाफ 16 विकेट लेकर जो कमाल दिखाया उसे फिर वे दोहरा न सके।

चौथा दौर :-

यह वह दौर है जो 91 से शुरू हुआ। इसी में कुंबले का आगाज हुआ जिन्हे कुछ समय के तक वेंकटपति राजू और राजेश चौहन का साथ मिला उस समय ऐसा लगने लगा कि भारतीय फिरकी का सुनहरा दौर फिर शुरू हो गया है लेकिन यह मंगेरीलाल के सपने की तरह जल्द ही टूट गया। बाद में कुंबले को सुनील जोशी, हरभजन और मुरली कातिर्क साथ मिला जिसमें हरभजन के अलावा कोई भी विश्वस्तरीय गेंदबाज साबित नहीं हो सका। लेकिन उन्हें भी एक साथ गेंदबाजी करने का मौका बहुत कम मिला है। अब तो कुंबले सन्यास ले चुके है, तो ये देखना बङा दिलचस्प रहेगा की हरभजन का साथ कौन निभायेगा अमित मिश्रा या प्रज्ञान ओझा मगर आज के दौर के क्रिकेट हम नजर दौड़ाते तो देखते हैं कि अंतिम ग्यारह में मुश्किल से ही दो स्पिनरों को जगह मिलती है टीम तीन तेज गेंदबाजों, एक स्पिनर और कामचलाउ गेंदबाजों के साथ उतरती है। इससे भी स्पिम गेंदबाजी पर असर पड़ रहा है। क्रिकेट का इतिहास गवाह है कि स्पिन जोंड़ी दार के साथ ही हिट हुआ है। बेदी – प्रसन्ना, लेकर – लाक , बिले ओ टिले – क्लेरी ग्रिमेंट , कादिर – अहमद , एंबुरी – हेमेंग्स , केंबले – राजू ये जोड़ीयाँ अपने अपने समय बल्लबाजों पर कहर बरपाती थी। ऐसे में टीम के अकेले स्पिन गेंदबाजों पर दबाव कहीं अधिक होता जा रहा है क्रिकेट जिस तरह पावर गेम होता जा रहा है उसमें बल्लेबाज भी स्पिन गेंदबाजों पर ज्यादा से ज्यादा रन जुटाने में लगे रहते है।

फुटबॉल में भारत

फुटबॉल ये नाम हमलोगों के लिए अभी कुछ दिनों पहले बेगाना सा लगता था, और ऐसा होना स्वाभाविक था। क्योंकि हमने फुटबॉल में कौन सा बङा तीर मार लिया है। फुटबॉल विश्व कप शुरू हुए 79 साल हो गए है, हम अभी उसमें क्वालिफाई भी नहीं कर पाए, और अगले कई दशकों तक तो इसकी उम्मीद भी करना एक बङी मूर्खता होगी। ओलंपिक में खेले हुए 49 साल गुजर चुके हैं लेकिन अब इसमें भी क्वालिफाई करने के आसार नजर नहीं आ रहे है।

अब तो हमारी स्थिति यह हो गई है कि दक्षिण एशियाई देशों में भी हम नहीं टिकते हैं। लेकिन नेहरू गोल्ड कप की सफलता से ऐसा लगने लगा है कि हमारी फुटबॉल पटरी पर आ सकती हैं। शायद नेहरू कप कि जीत से भारतीय फुटबॉल की तस्वीर बदल जाए, इसे प्रायोजक मिले, इसमें पैसा आए और अंततः खिलाङियों का रूझान बढ़े। लेकिन यहां पर यह बात साफ है कि 1950 से 1960 का जो हमारा स्वर्णिम दौर था, वह फिर से वापस नहीं आ सकता है। एशिया की महाशक्ति बनकर फिर से चैंपियन बनना अब भारत के बूते की बात नहीं है। इससे साफ जाहिर है कि हमारा घरेलू फुटबॉल का ढ़ांचा कितना बिगङा हुआ है, इसे अंतराष्ट्रीय स्तर का बनाने के चक्कर में हमने इसे निम्न स्तर का बना दिया। साथ ही कई अच्छे टूर्नामेंटों की बलि चढ़ा दी, देश को चैंपियन खिलाड़ी देने वाले फेडरेशन कप को भी गर्त में डाल दिया क्योंकि हमें तो राष्ट्रीय फुटबॉल लीग को ऊंचाईयों तक ले जाना था, लेकिन ये भी न हो सका।

आज हम जिस नेहरू गोल्ड कप की सफलता की खुशी मना रहे है उसका भी आयोजन एक दशक के बाद हुआ है। है। प्रायोजकों की कमी और कुछ अन्य कारणों से 1997 से 2007 तक इस टूर्नामेंट का आयोजन नहीं हो सका था। बॉब हॉटन के 2007 में कोच बनने के साथ इसे दोबारा शुरू किया गया। पिछले दो संस्करणों से भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की अग्रणी कंपनी-तेल व प्राकृतिक गैस आयोग (ओएनजीसी) इसे प्रायोजित कर रही है । सन् 1982 में जब यह टूर्नामेंट शुरू हुआ था तो इसमें दुनिया की चोटी की टीमों ने शिकरत किया था। इटली, अर्जेंटीना, कैमरून, डेनमार्क, घाना, उरूग्वे जैसी दुनिया की नामचीन देशों की टीमों ने भाग लिया। लेकिन बाद में निरन्तर अंतराल पर इस टूर्नामेंट के न होने से इनकी भी शिकरत करने की इच्छा जाती रही। इस बार फिर टूर्नामेंट भारत ने जीता जरूर है लेकिन इसमें शिकरत करने वाली टीमों पर निगाह डालें तो वे विश्व स्तर की टीमों के सामने कहीं नहीं टिकती हैं। इसलिए इस सफलता जश्न मनाना अभी जल्दबाजी होगी। यह बात आने वाले वर्षों में ही तय होगा की भारत की स्थिति एशिया और विश्व फुटबॉल में क्या होगी।

अगर हम कोच की तरफ देखें तो यूगोस्लावियाई कोच के. मिलोवान के बाद इंग्लिश कोच बॉब हॉटन ही ऐसे कोच है जिनसे खिलाङी खुश है। वास्तव में हॉटन ने भारतीय खिलाङियों में जीत की ललक बढ़ाई उनके खेल को आक्रामक बनाया, सकारात्मक फुटबॉल का अंदाज सिखाया, नतीजा नेहरू गोल्ड कप के रूप में हमारे सामने है।

1982

उरूग्वे

चीन

2-0

1983

हंगरी

चीन

2-1

1984

पोलैंड

चीन

1-0

1985

सोवियत संघ

यूगोस्लाविया

2-1

1986

सोवियत संघ

चीन

1-0

1987

सोवियत संघ

बुल्गारिया

2-0

1988

सोवियत संघ

पोलैण्ड

2-0

1989

हंगरी

सोवियत संघ

2-1

1991

रोमानिया

हंगरी

3-1

1993

उतरी कोरिया

रोमानिया

2-0

1995

इराक

रूस

1-0

1997

इराक

उज्बेकिस्तान

3-1

2007

भारत

सीरिया

1-0

2009

भारत

सीरिया

5-4