मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

गुम होती फिरकी

क्रिकेट कि दुनिया मे एक से बढकर एक फिरकी गेंदबाज देने वाले देश भारत में आज फिरकी गेंदबाजों का आकाल पड़ चुका है। जिसने अपने फिरकी गेंदबाजों की बदौलत ही दुनिय़ा भर के दिगजो को धुल चटाया हुआ है। आज वही फिरकी लगभग दम तोड़ने की स्थिती से गुजर रहा है। इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कुंबले और हरभजन के अलवा कोई ऐस गेदबाज नही दिखता है जो अंतराष्टीय स्तर की गेंदबाजीं कर सके। कुंबले वैसे भी फटा-फटा क्रिकेट को अलविदा कह चुके है और ज्यादा से ज्यादा दो साल और अपने जौहर का कमाल दिखा पाएगें। अपने करीब 18 साल के करिअर और पचास हजार से ज्यादा गेंदें फेक चुके इस शानदार क्रिकेटर से अब उम्मीद नहीं करनी चाहिए। वैसे भी समीझको की माने तो भारतीय क्रिकेट के इतिहास में फिरकी गेंदबाजी कभी इतनी मुश्किल दौर से नहीं गुजरा है। यह समस्या कोइ रातों रात नहीं हुई। 90 के दशक तक घरेलु क्रिकेट में फिरकी गेंदबाजों का जलवा हुआ करता था। लेकिन 1995-96 में रणजी में फेंके गए कुल ओवरों का 66 प्रतिशत स्पिन गेंदबाजों नें फेंका इन्होने कुल गिरे विकेटों का 67 प्रतिशत आपस में बाँटे। लेकिन जब गांगुली और जान राइट भीरतीय क्रिकेट का काया पलट करने में लगे थे तो वे तेज गेंदबाजों को प्रोत्साहन और बेहतर प्रशिझण पर जोर दिया गया। नतीजा 2005-06 में तो घरेलु सत्र में सिफॅ 46 फीसदी ओवर ही स्पनरो के खाते में आया और वे 42 प्रतिशत विकेट ही चटका पाए।

गांगुली - राइट का यह प्रयोग बाद में द्रविड़-चैपल ने भी जारी रखा। 2000-01 से लेकर बांग्लादेश सीरीज तक टीम ने 72 टैस्ट मैच खेले इनमें से महज एक स्पिनर 34 मैचों मे कुंबले और हरभजन सिंह को एक साथ खेलने का मौका मिला। 28 टैस्ट मैंचो मे टीम महज एक स्पिनर के साथ मैदान में उतरी। ये कोइ छोटा-मोटा बदलाव नहीं हैं। यह उस बदलाव की झलक है जिस टीम के स्पिनरों की दुनिया में तुती बोलती थी।

अगर हम भारतीय स्पिन गेंदबाजी की बात करें तो इसे चार दौर में हम आसानी से अलग-अलग कर सकते हैं।

पहला दौर :-

1946 से 1960 का भारतीय क्रिकेट जो अभी अपने बचपन से गुजर रहा था। इस में बीनू मंनकंड जैसा आलराउण्डर मिला जो अपने स्पिन पर बल्लेबाजों को घुमाते थे ही साथ में बल्ले से भी जौहर दिखाते थे उन्हे लेग स्पिनर सुभाष गुप्ते और आफ स्पिनर गुलाम अहमद का साथ मिला।

दूसरा दौर :-

यह वह दौर था जब भारतीय फिरकी गेंदबाजों के सामने बड़े से बड़े बल्लेबाज पानी माँगते नजर आते थे यह दौर था प्रसन्ना भागवत चंद्रशेखर बिशन सिंह बेदी और वेंकट राघवन का जो की 1961 से 1982 तक रहा जिसे भारतीय फिरकी का स्वणॅ युग भी कहा जाता है। इस दौर में भारतीय टीम अकेली ऐसी टीम थी जो अपने स्पिनरों की बदौलत टेस्ट मैच जीतती थी। चंद्रशेखर और बेदी को तो फिरकी का जादूगर कहा जाता है। ये दोनो लेग स्पिनर तथा प्रसन्ना और राघवन ऑफ स्पिनर थे। बेदी प्रसन्ना और चंद्रशेखर की तिकड़ी के सामने बड़े से बड़ो ने घुटने टेक दिये थे।

तीसरा दौर :-

80 से 90 के दशक मे दिलीप दोषी, शिवलाल यादव और मनिंदर सिंह का रहा। ये भले ही उस उँचाइ को ना छू पाए लेकिन उस विरासत को आगे बढाया। इसी दौर में नरेंद्र हिरवानी और शिवरामकृष्णन आए लेकिन ये मैच जिताऊ नही बन पाए। हिरवानी ने अपने पहले टेस्ट में वेस्ट इंडीज के खिलाफ 16 विकेट लेकर जो कमाल दिखाया उसे फिर वे दोहरा न सके।

चौथा दौर :-

यह वह दौर है जो 91 से शुरू हुआ। इसी में कुंबले का आगाज हुआ जिन्हे कुछ समय के तक वेंकटपति राजू और राजेश चौहन का साथ मिला उस समय ऐसा लगने लगा कि भारतीय फिरकी का सुनहरा दौर फिर शुरू हो गया है लेकिन यह मंगेरीलाल के सपने की तरह जल्द ही टूट गया। बाद में कुंबले को सुनील जोशी, हरभजन और मुरली कातिर्क साथ मिला जिसमें हरभजन के अलावा कोई भी विश्वस्तरीय गेंदबाज साबित नहीं हो सका। लेकिन उन्हें भी एक साथ गेंदबाजी करने का मौका बहुत कम मिला है। अब तो कुंबले सन्यास ले चुके है, तो ये देखना बङा दिलचस्प रहेगा की हरभजन का साथ कौन निभायेगा अमित मिश्रा या प्रज्ञान ओझा मगर आज के दौर के क्रिकेट हम नजर दौड़ाते तो देखते हैं कि अंतिम ग्यारह में मुश्किल से ही दो स्पिनरों को जगह मिलती है टीम तीन तेज गेंदबाजों, एक स्पिनर और कामचलाउ गेंदबाजों के साथ उतरती है। इससे भी स्पिम गेंदबाजी पर असर पड़ रहा है। क्रिकेट का इतिहास गवाह है कि स्पिन जोंड़ी दार के साथ ही हिट हुआ है। बेदी प्रसन्ना, लेकर लाक , बिले ओ टिले क्लेरी ग्रिमेंट , कादिर अहमद , एंबुरी हेमेंग्स , केंबले राजू ये जोड़ीयाँ अपने अपने समय बल्लबाजों पर कहर बरपाती थी। ऐसे में टीम के अकेले स्पिन गेंदबाजों पर दबाव कहीं अधिक होता जा रहा है क्रिकेट जिस तरह पावर गेम होता जा रहा है उसमें बल्लेबाज भी स्पिन गेंदबाजों पर ज्यादा से ज्यादा रन जुटाने में लगे रहते है।

फुटबॉल में भारत

फुटबॉल ये नाम हमलोगों के लिए अभी कुछ दिनों पहले बेगाना सा लगता था, और ऐसा होना स्वाभाविक था। क्योंकि हमने फुटबॉल में कौन सा बङा तीर मार लिया है। फुटबॉल विश्व कप शुरू हुए 79 साल हो गए है, हम अभी उसमें क्वालिफाई भी नहीं कर पाए, और अगले कई दशकों तक तो इसकी उम्मीद भी करना एक बङी मूर्खता होगी। ओलंपिक में खेले हुए 49 साल गुजर चुके हैं लेकिन अब इसमें भी क्वालिफाई करने के आसार नजर नहीं आ रहे है।

अब तो हमारी स्थिति यह हो गई है कि दक्षिण एशियाई देशों में भी हम नहीं टिकते हैं। लेकिन नेहरू गोल्ड कप की सफलता से ऐसा लगने लगा है कि हमारी फुटबॉल पटरी पर आ सकती हैं। शायद नेहरू कप कि जीत से भारतीय फुटबॉल की तस्वीर बदल जाए, इसे प्रायोजक मिले, इसमें पैसा आए और अंततः खिलाङियों का रूझान बढ़े। लेकिन यहां पर यह बात साफ है कि 1950 से 1960 का जो हमारा स्वर्णिम दौर था, वह फिर से वापस नहीं आ सकता है। एशिया की महाशक्ति बनकर फिर से चैंपियन बनना अब भारत के बूते की बात नहीं है। इससे साफ जाहिर है कि हमारा घरेलू फुटबॉल का ढ़ांचा कितना बिगङा हुआ है, इसे अंतराष्ट्रीय स्तर का बनाने के चक्कर में हमने इसे निम्न स्तर का बना दिया। साथ ही कई अच्छे टूर्नामेंटों की बलि चढ़ा दी, देश को चैंपियन खिलाड़ी देने वाले फेडरेशन कप को भी गर्त में डाल दिया क्योंकि हमें तो राष्ट्रीय फुटबॉल लीग को ऊंचाईयों तक ले जाना था, लेकिन ये भी न हो सका।

आज हम जिस नेहरू गोल्ड कप की सफलता की खुशी मना रहे है उसका भी आयोजन एक दशक के बाद हुआ है। है। प्रायोजकों की कमी और कुछ अन्य कारणों से 1997 से 2007 तक इस टूर्नामेंट का आयोजन नहीं हो सका था। बॉब हॉटन के 2007 में कोच बनने के साथ इसे दोबारा शुरू किया गया। पिछले दो संस्करणों से भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की अग्रणी कंपनी-तेल व प्राकृतिक गैस आयोग (ओएनजीसी) इसे प्रायोजित कर रही है । सन् 1982 में जब यह टूर्नामेंट शुरू हुआ था तो इसमें दुनिया की चोटी की टीमों ने शिकरत किया था। इटली, अर्जेंटीना, कैमरून, डेनमार्क, घाना, उरूग्वे जैसी दुनिया की नामचीन देशों की टीमों ने भाग लिया। लेकिन बाद में निरन्तर अंतराल पर इस टूर्नामेंट के न होने से इनकी भी शिकरत करने की इच्छा जाती रही। इस बार फिर टूर्नामेंट भारत ने जीता जरूर है लेकिन इसमें शिकरत करने वाली टीमों पर निगाह डालें तो वे विश्व स्तर की टीमों के सामने कहीं नहीं टिकती हैं। इसलिए इस सफलता जश्न मनाना अभी जल्दबाजी होगी। यह बात आने वाले वर्षों में ही तय होगा की भारत की स्थिति एशिया और विश्व फुटबॉल में क्या होगी।

अगर हम कोच की तरफ देखें तो यूगोस्लावियाई कोच के. मिलोवान के बाद इंग्लिश कोच बॉब हॉटन ही ऐसे कोच है जिनसे खिलाङी खुश है। वास्तव में हॉटन ने भारतीय खिलाङियों में जीत की ललक बढ़ाई उनके खेल को आक्रामक बनाया, सकारात्मक फुटबॉल का अंदाज सिखाया, नतीजा नेहरू गोल्ड कप के रूप में हमारे सामने है।

1982

उरूग्वे

चीन

2-0

1983

हंगरी

चीन

2-1

1984

पोलैंड

चीन

1-0

1985

सोवियत संघ

यूगोस्लाविया

2-1

1986

सोवियत संघ

चीन

1-0

1987

सोवियत संघ

बुल्गारिया

2-0

1988

सोवियत संघ

पोलैण्ड

2-0

1989

हंगरी

सोवियत संघ

2-1

1991

रोमानिया

हंगरी

3-1

1993

उतरी कोरिया

रोमानिया

2-0

1995

इराक

रूस

1-0

1997

इराक

उज्बेकिस्तान

3-1

2007

भारत

सीरिया

1-0

2009

भारत

सीरिया

5-4