रविवार, 18 अगस्त 2013

राष्ट्रीय खेल या राष्ट्रीय खेद

सौ करोड़ के भारत में हाकी ने दम तोड़ दिया है।  भारत के लिए इससे ज्यादा शर्म की बात क्या हो सकती है की जो भारत का राष्ट्रीय खेल है , जिस खेल की बदौलत भारत ने कभी अन्तराष्ट्रीय जगत में नाम कमाया था, उसी खेल की वजह से भारत को आज बेशर्मी झेलनी पड़रही है |
हमारे देश के पास आठ ओलम्पिक स्वर्ण पदकों का उत्कृष्ट रिकॉर्ड है। भारतीय हॉकी का स्वर्णिम युग 1928-56 तक था जब भारतीय हॉकी दल ने लगातार 6 ओलम्पिक स्वर्ण पदक प्राप्त किए। भारतीय हॉकी दल ने 1975 में विश्व कप जीतने के अलावा दो अन्य पदक (रजत और कांस्य) भी जीते। भारतीय हॉकी संघ ने 1927 में वैश्विक संबद्धता अर्जित की और अंतरराष्ट्रीय हॉकी संघ (एफआईएच) की सदस्यता प्राप्त की। इस प्रकार भारतीय हॉकी संघ के इतिहास की शुरूआत ओलम्पिक में अपनी स्वर्ण गाथा आरंभ करने के लिए की गई। इस दौरे में भारत को 21 मैचों में से 18 मैच भारत ने जीते और प्रख्यात खिलाड़ी ध्यान चंद सभी की आंखों में बस गए जब भारत के कुल 192 गोलों में से 100 गोल उन्होंने अकेले किए। यह मैच एमस्टर्डम में 1928 में हुआ और भारत लगातार लॉस एंजेलस में 1932 के दौरान तथा बर्लिन में 1936 के दौरान जीतता गया और इस प्रकार उसने ओलम्पिक में स्वर्ण पदकों की हैटट्रिक प्राप्त की।
स्वतंत्रता के बाद भारतीय दल ने एक बार फिर 1948 लंदन ओलम्पिक, 1952 हेलसिंकी गेम तथा मेलबॉर्न ओलम्पिक में स्वर्ण पदक जीत कर हैटट्रिक प्राप्त की। इस स्वर्ण युग के दौरान भारत ने 24 ओलम्पिक मैच खेले और सभी 24 मैचों में जीत कर 178 गोल बनाए (प्रति मैच औसतन 7.43 गोल) तथा केवल 7 गोल छोड़े। भारत को 1964 टोकियो ओलम्पिक और 1980 मॉस्को ओलम्पिक में दो अन्य स्वर्ण पदक प्राप्त हुए।
भारत ने ओलंपिक में लगातार आठ स्वर्ण पदक जीत कर जो पहचान बनायी थी, आज भारत सरकार और खेल प्रशासन की वजह से वो पहचान लगभग खो सी गयी है | हॉकी का जो अपमान देश में हुआ, उसकी मिसाल शायद कहीं ढूंढें नहीं मिलेगी| भारतीय हॉकी टीम चीन में चल रही एशियन चैम्पियनशिप जीत कर लौटी तो हॉकी इंडिया ने विजयी टीम के प्रत्येक खिलाड़ी को २५-२५ हज़ार रुपये ईमान में देने की घोषणा कर दी| हॉकी के प्रति बरते जा रहे इस सौतेले व्यवहार से क्षुब्ध विजेता टीम के खिलाड़ियों ने हॉकी इंडिया की इस पेशकश को ठुकरा दिया| जैसे ही खिलाड़ियों ने इनामी राशि को ठुकराया; पूरे देश में हॉकी इंडिया की आलोचना होने लगी| इससे आजिज हॉकी इंडिया के महासचिव नरेन्द्र बत्रा ने हॉकी खिलाड़ियों को लालच से दूर रहने की हिदायत दे डाली| उनका कहना था कि खिलाड़ियों को अपने खेल पर ही ध्यान देना चाहिए और जो मिल रहा है उसे स्वीकार कर लेना चाहिए| मगर, उनका यह उपदेश न तो खिलाड़ियों को रास आया और न ही देश को| गाहे-बगाहे सरकार की भी आलोचना होने लगी तो खेल मंत्री अजय माकन को मैदान में उतरना ही पड़ा| उन्होंने मीडिया को स्पष्ट किया कि खिलाड़ियों को इनाम देने का फैसला हॉकी इंडिया का था न कि सरकार का| सरकार सभी रुपये खिलाड़ियों के कोचिंग कैंप और ट्रेनिंग पर खर्च करती है| उनका कहना है कि सरकार ने पिछले 6 माह में हॉकी इंडिया पर 7.81 करोड़ रुपये की रकम खर्च की है| इसमें 5.97 करोड़ रुपये कोचिंग कैंप, 1.75 करोड़ रुपये विदेशी दौरों और 8.75 लाख रूपए विदेशी विशेषज्ञ पर किया गया खर्च शामिल है| हो सकता है कि माकन का कहना सही हो मगर क्या वे यह नहीं जानते कि खेल में विजेता टीम को उचित इनाम मिलना ही चाहिए और खेल मंत्री होने के नाते उनकी जिम्मेदारी है कि वे स्वयं पहल कर विजेता टीम का उचित "सत्कार" करते|
हॉकी को भारत का राष्ट्रीय खेल कहा जाता है| हॉकी ने ही कई दशकों तक ओलंपिक खेलों में भारत का झंडा बुलंद किया हुआ था| हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को कौन भूल सकता है जिन्होंने अपने खेल कौशल से भारतीय हॉकी को बुलंदी की ऊँचाइयों तक पहुँचाया था| मगर व्यावसायिकता की चकाचौंध और विदेशी कंपनियों के भ्रामक प्रचार-प्रसार ने हॉकी को खेल परिदृश्य से हाशिये पर ला पटका| रही-सही कसर सरकारी नीतियों ने पूरी कर दी|
दो दशकों से भारत में राष्ट्रीय खेल हॉकी के प्रति सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं ने उदासीनता का रवैया अख्तियार कर रखा है| क्रिकेट को ही खेल मानने की मानसिकता ने भी हॉकी की लोकप्रियता को जमकर आघात पहुँचाया है| भद्रजनों के इस खेल का विश्व-विजेता बनने के पश्चात भारतीय क्रिकेट टीम पर केंद्र एवं राज्य सरकारों ने रुपयों सहित अनेक सुविधाओं की बरसात कर दी थी| यहाँ तक कि रेल मंत्रालय ने सभी विजेता खिलाड़ियों को प्रथम श्रेणी वातानुकूलित डिब्बे में आजीवन मुफ्त यात्रा हेतु रेलवे पास प्रदान किए थे| बीसीसीआई ने भी प्रत्येक खिलाड़ी को १ करोड़, प्रत्येक सहायक कर्मी को ५० लाख और प्रत्येक चयनकर्ता को २५ लाख की नगद राशि इनाम के रूप में दी थी|
वैसे हॉकी इंडिया की इस बात में तो दम दिखता है कि चूँकि बीसीसीआई अमीर क्रिकेट बोर्ड है और पूरे विश्व में उसकी तूती बोलती है; जिस वजह से क्रिकेट खिलाड़ियों पर रुपयों की बरसात होना स्वाभाविक है| मगर यह भी नहीं भूलना चाहिए कि हॉकी की इस दुर्दशा के पीछे भी हॉकी इंडिया की उदासीनता ही है| क्या हॉकी इंडिया में इतनी ताकत भी नहीं बची कि वह सरकार पर दबाव डालकर हॉकी खिलाड़ियों के लिए बेहतर सुविधाओं की मांग कर सके?
कहते हैं जब कोई भी संस्थान या व्यक्ति अपने पतनके दौर से गुज़रता है तो एक दिन उसका उत्थान भी होता है, यानी उतार-च़ढाव की स्थिति सब पर लागू होती है। अगर नहीं लागू होती है तो वह है हमारी भारतीय हॉकी टीम, जी हां, दुनिया में हर बदहाल संस्था और टीम के दिन बहुर सकते हैं, लेकिन भारतीय हॉकी टीम के बारे में यही कह सकते है कि यह फिर से कामयाबी का सवेरा शायद ही कभी देख सके। बात स़िर्फ खिताबों के जीतने की ही नहीं, बल्कि हॉकी की संस्थात्मक स़डन से है। आज हॉकी के अंदर और बाहर का पूरा तंत्र इस क़दर स़ड चुका है कि जब भी हॉकी से जु़डी खबर आती है, तो कुछ न कुछ ऐसा ज़रूर होता है जिससे हमारे राष्ट्रीय खेल की फज़ीहत हो जाती है। अंतरराष्ट्रीय मुक़ाबलों में शर्मनाक हार झेलना तो बहुत पुरानी बात हो चुकी है। अब हम अपने देश में ही आपसी ल़डाई देख रहे हैं। कभी कोच के सेक्स स्कैंडल हॉकी को शर्मसार करते हैं तो कभी खिला़डी खुद के मेहनताने को लेकर स़डक पर विरोध प्रदर्शन के लिए उतर आते हैं। इतना ही नहीं टीम के खिलाडि़यों के आपसी संबंधों पर भी विवाद बची खुची कसर पूरी कर देते हैं। कुल मिलाकर हॉकी आज अपने निम्नतम दौर से गुज़र रही है, लेकिन मुश्किलें हैं कि फिर भी खत्म होने का नाम ही नहीं लेती हैं। अभी ताज़ा मामला चैम्पियंस ट्रॉफी और ओलंपिक क्वालीफाइंग टूर्नामेंट की मेज़बानी को लेकर उठ । इस बात से तो सभी वाक़ि़फ हैं कि पिछले कुछ दिनों से अंतरराष्ट्रीय हॉकी महासंघ (एफआईएच), हॉकी इंडिया (एचआई) और भारतीय हॉकी महासंघ (आईएचएफ) के बीच हुए आपसी समझौते से नाराज़ चल रहा था। इस बात का अंदेशा लगाया जा रहा था कि अंतरराष्ट्रीय हॉकी महासंघ (एफआईएच) ज़रूर कोई न कोई ठोस क़दम उठाएगा, ऐसा ही हुआ। हॉकी इंडिया (एचआई) और भारतीय हॉकी महासंघ (आईएचएफ) के बीच हुए आपसी समझौते से नाराज़ अंतरराष्ट्रीय हॉकी महासंघ (एफआईएच) ने भारत से चैंपियंस ट्रॉफी और ओलंपिक क्वालीफाइंग टूर्नामेंट की मेज़बानी छीन ली। उसके इस क़दम ने न स़िर्फ हॉकी संघ की फज़ीहत की है, बल्कि इससे देश की भी फज़ीहत झेलना पङा।

हाकी का स्वर्णिम इतिहास यह कहता है कि जब तक हाकी खिलाडि़यों के हाथ में थी तब तक उसे कोई दूसरा देश छू नहीं पाया जैसे ही हाकी राजनीतिज्ञों, नौकरशाहों और खेल के दलालों के हाथों में पहुंच गई हाकी अपना मूल खेल खो बैठी। अगर इस खेल की बदहाली यूं ही जारी रही तो बहुत खेद के साथ कहना प़ड सकता कि हॉकी स़िर्फ स्कूल के किताबों तक ही राष्ट्रीय खेल रह जाएगा। और हम भी बङे शान से अपने आनेवाली पीढी को कहेंगें हाकी में हमनें आठ ओलम्पिक स्वर्ण पदक जीते है, तो शायद ही आनेवाली पीढी इस बात पर भरोसा करेगी।   

शुक्रवार, 14 जून 2013

राष्ट्रीय राजनीतिकक्षेत्र में मोदी

काफी जद्दोजहद और कश्मकश के बाद भाजपा अटल – आडवाणी के युग से बाहर निकल पीढी का बदलाव हो गया। अटल बिहारी वाजपेयी स्वास्थ्य कारणों से राजनीतिक परिदृश्य से बाहर बाहर हो गए जबकि आडवाणी अपनी प्रधानमंत्री बनने की लोलुपसा के शिकार हो गए। गोवा कार्यकारणी के दो दिवसीय बैठक में काफी उठा – पटक के बाद आखिरकार भाजपा ने अपने मिशन 2014 की कमान अपने सबसे लोकप्रिय नेता नरेन्द्र दामोदरदास मोदी  के हाथो में थमा दी।  
          नरेन्द्र मोदी का चुनाव प्रचार अभियान का प्रमुख बनना प्रधानमंत्री पद के लिए उनकी दावेदारी पर परोक्ष रुप से मुहर लगने जैसा है। वह जिन हलात में चुनाव प्रचार अभियान समिति के प्रमुख बने उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि उनके सामने कई तरह की चुनौतियाँ है। क्योंकि जिस तरह से भाजपा में चुनाव प्रचार अभियान समिति के प्रमुख का फैसला करने से पहले कलह की जो स्थिती बनी उससे मोदी के समक्ष यह और अच्छे से स्पष्ट हो जाना चाहिए कि उनकी पहली जरुरत पार्टी को एक सूत्र में बांधने की है और जाहिर है दूसरी जरुरत चुनाव प्रचार के जरिये ऐसा माहौल पैदा करने की है कि भाजपा हर लिहाज से कांग्रेस का कहीं अधिक मजबूत विकल्प नजर आने लगे।  
      अब जब आम चुनाव में बहुत कम समय रह गया है और एक विचार जनता की अदालत  फैसला इसी साल हो जाने का भी है तब राष्ट्रीय राजनीति का कोहरा धीरे – धीरे छंटने लगा है। अपने जयपुर अधिवेशन में जहाँ काग्रेस ने राहुल गांधी को अपना उपाध्यक्ष निर्वाचित करके उन्हे भावी प्रधानमंत्री के रुप में प्रस्तुत करने के संकेत दिये थे वहीं भाजपा ने गोवा मे मेदी को चुनावी कमान थमा दी। इस प्रकार चुनाव 2014 देश की दो बङी पार्टीयों के बीच की टक्कर न होकर दो व्यक्तित्वो के बीच की टक्कर होगी। भारतीय इतिहास शायद ऐसा पहली बार होगा।
      व्यक्तित्व का यह मामला श्रम बनाम सामंत का भी है। जहाँ नरेन्द्र मोदी चाय के ठेले से अपने पेशेवर जिन्दगी का आगाज करके आज एक कुशल राजनेता और सफल मुख्यमंत्री के साथ अच्छे प्रबंधंक के रुप में अपने आप को स्थापित किया है। उनके व्यक्तित्व का यह पक्ष इतना वजनदार है कि उसके समानंतर चलने वाला उनका सांप्रदायिक चरित्र वाला पक्ष धीरे – धारे पीछे छूटता जा रहा है। पिथले दस बारह सालों में मोदी को खलनायक साबित करने के लिये जितने प्रयास देश और विदेश में किये गये वैसा शायद ही किसी राजनेता के लिए किया गया हो। इसके बावजूद मोदी की लोकप्रियता बढती जा रही है और हमलावरों के हथियार भोथरे साबित होते जा रहे है। मोदी नकारात्मकता में उलक्षने बजाय ध्येय की ओर बढते जा रहे है। आज स्थति यहाँ तक आ पहुची है कि यूरोपिय समुदाय से बहिष्कृत यह नेता उन्ही के देश में सम्मानित हो रहा है। अमेरिकी संसद में भी उनके पक्ष में आवाजें गुंजने लगी है। यह राजनीतिक विसात पर उनकी ठोस तथा दमदार चालों का परिणाम है।
      वहीं दूसरी ओर नेहरु गांधी की विरासत का झोला थामें राहुल गांधी है। जिन्होनें अपनी सरकार के नौ साल के लंबे कार्यकाल में किसी मंत्रालय तक की भी जिम्मेदारी न संभालकर न तो अपनी क्षमता का परिचय दिया और न ही कोई प्रशासनिक प्रशिक्षण लेना उचित समझा। हाँ राज्यों के चुनावों में अपनी पार्टी की बागडोर जरुर संभाली, लेकिन परीणाम पहले से कुछ अच्छे नहीं आये हाँ बुरे परिणामों से दो चार जरुर होना पङा। उनकी सबसे बङी राजनीतिक उपलब्धि यह रही कि चुनाव 2009 में वह उत्तर प्रदेश में पार्टी को उल्लेखनीय सफलता दिलाने में सफल रहे। लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में उनके धुआँधार प्रचार के बावजूद पार्टी दयनीय स्थिती में रही और तो और खुद के संसदीय क्षेत्र में भी पार्टी को भारी पराजय का सामना करना पङा।
      देश की आज जैसी दुर्दशा है उसमें बदलाव का एक मात्र भरोसा जनता को मोदी में नजर आ रही है। आखिर क्यों देशव्यापी लोकप्रियता वाला दूसरा कोई राजनेता नहीं है? अगर खबरिया चैनलो द्वारा कराये गए चुनाव पूर्व आकलन पर गौर करें तो भाजपा को 31 प्रतिशत मत मिलने की संभावना है इतना मत प्रतिशत 200 के करीब या उससे अधिक सीटें दिला सकता है भाजपा अगर अपना प्रधानमंत्री मोदी को घोषित कर देता है तो उसके वोट प्रतिशत और बढ सकते है साथ ही वोटों के ध्रुवीकरण को कारण कांग्रेस को भी वोटों के प्रतिशत में बढोतरी होगी। जिसका सीधा नुकसान क्षेत्रीय दलों को होगा तो मोदी को लेकर उनके अंदरखाने उथल पुथल की स्थिती होना लाज़मी है। लेकिन यह सब महज एक आकलन है।           

बुधवार, 20 जून 2012

सिर्फ वोट की राजनीति


     आज जिस तरह से जद (यु) नेता सेक्युलर होने दंभ भर रहे है और इसी सेक्युलरवादी होने के नाते वे नरेन्द्र मोदी पर निशाना साध कर प्रधानमंत्री पद के लिए नरेन्द्र मोदी की दावेदारी खारिज कर रहे है और परोक्ष रूप से नीतीश की दावेदारी प्रस्तुत कर रहे है।  लेकिन यहाँ सवाल यह उठता है कि एक दशक पहले जद (यु) नेताओं को क्या सेक्युलरवाद याद नही था। याद कीजिए, 2002 फरवरी में जब गुजरात दंगा हुआ तब नीतीश कुमार बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार में रेल मंत्री थे और किसी ने शायद ही सुना हो कि उन्होंने इसके विरोध में सार्वजनिक रूप  से एक भी शब्द बोले हो। क्या उस समय उन्हे अल्पसंख्यको की याद नहीं आई थी।
     आज नीतीश कुमार बिहार के प्रगति के अगुवा बने हुए है इसी प्रगति के कारण बिहार की जनता ने उन्हे प्रचंड बहुमत दिया है। लेकिन क्या किसी ने यह सोचा है कि क्या सही में 2010 मे राजग को जो प्रचंड बहुमत बिहार की जनता ने दिया था वह सिर्फ विकास के नाम पर था या फिर उसमें कहीं न कहीं उनके अंदर लालू के सत्ता में लौटने के डर की भूमिका ज़्यादा रही है।
     शायद नीतीश इसी जीत को लेकर भी धीरे धीरे ग़लतफहमी का शिकार हो रहे है। मोदी का विरोध करके शायद उन्हे लगता है कि अल्पसंख्यक वोट उन्हे मिलेगा, शायद हो भी सकता है और नहीं भी यह तो भविष्य ही तय करेगा। अगर मिला भी तो क्या गारंटी है कि एक मुश्त अल्पसंख्यक वोट उन्हे मिलेगा। लेकिन इस बात की गारंटी जरुर है कि भाजपा से अलग होने पर अगङी जाती का वोट बैंक उनसे छिटक जाएगा। यहां पर यह बात गौर करने लायक है कि जब 1996 में जब समता पार्टी (आज की जद (यु)) बीजेपी के साथ जुड़ी तो उसके पास मात्र 6 सांसद थे और बीजेपी के पास बिहार में 18 सांसद  थे। आज बीजेपी के बिहार में 12 सांसद हैं और जद (यू) के 20 जाहिर है पिछले 16 सालों में जद (यू) कम-से-कम बिहार में बीजेपी का ‘बड़ा भाई’ बन चुका है। नीतीश और बीजेपी दोनों को उस समय लालू का अजेय किला ढाहने के लिए एक-दूसरे के साथ की जरूरत थी, लिहाजा यह गठबंधन हुआ और धर्मनिरपेक्षता को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। तब आज क्यों धर्मनिरपेक्षता का रोना रोया जा रहा है। 

गुरुवार, 3 मार्च 2011

राहुल गांधी, नीतिगत कम रणनीति ज्यादा

मई 2009 में जब कांग्रेस दोबारा जीतकर सत्ता में आई तो आमजनता के बीच यह भावना काम कर रही थी कि मनमोहन सिंह वैश्विक मंदी के बावजूद देश के आर्थिक विकास को बनाए रखा। जिसका पुरस्कार जनता ने कांग्रेस को जिताकर दिया भी, लेकिन यूपीए 2 के कार्यकाल में जिस तरह से एक के बाद एक रहे घोटालों और भ्रष्टाचार के खुसासों से और लगातार बढती मंहगाई के कारण भारत का आम नगरिक ठगा सा महसूस कर रहा है। 2 - जी स्पेक्ट्रम के लेकर विपक्ष की जेपीसी मांग के सामने आखिर सरकार झुकी और जेपीसी गठीत कर अपना चारित्रीक सुधार में भले ही लग गई हो, लेकिन आने वाले चुनावों में जनता सरकार को माफी देने मूड में नही दिख रही है। इसका प्रमाण बिहार के चुनावी नतीजों को देखकर लगाया जा सकता है जहां काग्रेस बङा भारी उछाल मारने की सोच रहा था और उसने लगाया भी 9 सीटों से छलांग लगाकर 4 सीटों पर सिमट गई।

2011 मे काग्रेस के सामने जो सबसे बङा संकट है वो है नेतृत्व का फिलहाल कांग्रेस के पास व्यापक जनाधार वाला राष्ट्रिय स्तर का कोई भी कद्दावर नेता नही दिख रहा है। नीतीश कुमार, नरेन्द्र मोदी, डा. रमण सिंह और शिवराज सिंह चौहान जैसे दिग्गज नेताओं की तरह कांग्रेस के पास राज्यों मे भी कोई नेता नहीं दिख रहा है। ले – देकर राहुल गांधी फैक्टर ही कांग्रेस के पास अंतिम विकल्प दिख रहा है लेकिन बिहार के विधानसभा और उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनावों में न तो उनका करिश्मा चला और न चुनाव जिताने का कोई दम – खम अथवा राजनीतिक कौशल। चलिए ये मान लिया जाए की बिहार में उन्होने ज्यादा दौरा नही किया, जो किया वह भी चुनावीं महासंग्राम के वक्त किया या फिर वहां के चुनावी परिणाम पूरी तरह से एंटी लालू के कारण आए लेकिन उत्तर प्रदेश के बारे क्या तर्क दिया जा सकता है। जहां राहुल ने गांधी ने अपने कुल दौरों का 80 प्रतिशत दिया। पार्टी को जमीनी स्तर पर मजबूत करने का प्रयास भी किया। दलित और बुंदेलखंड के मुद्दे के साथ – साथ मायावती पर केन्द्र के पैसों का दुरुपयोग करने का मुद्दा भी लागतार उछाला। इन सबके बावजूद पंचायत चुनावों में मायावती ने अपनी मजबूत पकङ तो साबित की ही, साथ ही राहुल और काग्रेस के बौनेपन को भी दिखा दिया।

राहुल गांधी ने जबसे भारतीय राजनीति नें अपना राजिस्ट्रेशन करवाया था। उसके चन्द दिनों बाद ही वह भारतीय युवाओं के चहेते बन गए। कांग्रेस भी इससे अतिउत्साहित दिखी उसे लगने लगा कि देश का दूसरा जयप्रकाश नारायण आ गया है लेकिन इस बार उसके खिलाफ नहीं बल्की उनके कंधों से कंधा मिलाकर चलेगा। लेकिन राहुल गांधी में अभी राजनीतिक परिपक्वता और कूटनीतिक धार न के बराबर है अन्यथा अमेरिकी राजदूत से हिन्दू आतंकवाद की तर्कहीन चर्चा वह शायद ही करते। रही सही कसर संप्रग सरकार के मंत्रीयों ने पूरा कर दिया। युवाओं को लग रहा था कि राहुल गांधी इन भ्रष्टाचारियों के खिलाफ जरुर कार्यवाही करेगें, लेकिन कारवाई करनी तो दूर की बात रही राहुल गांधी ने इन भ्रष्टाचारियों के खिलाफ ज़ुबान तक खोलने की ज़हमत नही उठाई।

कितनी बार यह देखा गया कि राहुल गांधी का राजनीतिक आचरण भी उन्ही नेताओं के जैसा है जो राजनीतिक भ्रष्टाचार के मुद्दे पर दो मुंही बात किया करते है, और जनता को मूर्ख बनाने का काम करते है। इतिहास गवाह है कि देश का युवा अपना नायक उसे चुनता है जो ज़ुबान और कर्म में सामंजस्य बनाए रखता है। शायद युवाओं को लगने लगा है कि राहुल गांधी इन दोनों गुणों में सामंजस्य नहीं बिठा पा रहे है। शायद यही कारण है कि पिछले दिनों उत्तर प्रदेश दौरे के दौरन अलग – अलग हिस्सों मे युवाओं ने जिस तरीके से उनका विरोध किया उससे तो यही प्रतीत हो रहा है कि राहुल गांधी का करिश्मा अब चल नही पा रहा है, क्योकिं युवाओं की बात और उनकी वकालत करने के बावजूद युवा ही उनका विरोध सबसे ज्यादा कर रहे है। हालांकि देश के अलग – अलग हिस्सों में युवाओं के बीच जाकर राजनीति का ज्ञान बांटने वाले राहुल गांधी को भी यह आशा नही रही होगी की उन्हे उत्तर प्रदेश में इस तरह युवाओं का विरोध क्षेलना पङेगा।

गौरतलब है कि राहुल गांधी जिन विश्वविधालयों मे गए वहां अपनी कांग्रेस पार्टी का ही बख़ान करते रहे। और तो और विपक्षी दलों के खिलाफ खूब विषवमन किया, खासतौर पर भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस के खिलाफ उन्हों ने जिन शब्दों प्रयोग किया उससे देश का युवा बेहद ही नराज दिखा। राहुल गांधी की नजर में भले ही देश का युवा कच्चा और नासमझ हो, लेकिन आदर्शवादी राहुल गांधी के संदेश में छिपा सीयासत की गंध युवाओ को महसूस करते देर नही लगी। वह अच्छी तरह समझ गए है कि राहुल गांधी युवाओं को सीख देने के बहाने कांग्रेस के ऐजेंङे को ही आगे बढा रहे है।

वैसे भी अगर देखा जाए तो अभी राहुल की प्रतिभा प्रकट नहीं हुई है। अगर राहुल गांधी के सारे प्रकरण पर गौर किया जाए तो ऐसा लगता है कि उनकी छवि बनाई ज्यादा जा रही है और उसमें स्वाभाविकता कम ही दिखती है। मनमोहन सिह जहां भारत के विदेशी निवेश और उदारीकरण के सबसे बङे झंङाबरदार है वही राहुल की छवि ऐसी बनाई जा रही जैसे उदारीकरण के इस आंधी में वह आदिवासियों, किसानों और दबे – कुचलों के सबसे बङे खैरख्वाह है। इस पूरे प्रकरण को देखकर ऐसा नही लगता कि यह पूरा मामला स्वाभाविकता से परे है, नही तो आखिर क्या कारण है कि जिन मनमोहन सिंह की अमीरों के हित वाली कॉरपोरेट बाजार प्रणाली और अमेरिका समर्थीत नीतियां जगजाहिर है वहीं काग्रेस आलाकमान के पसंदीदा प्रधानमंत्री है ? हालांकि राहुल गांधी इसके उलट उन्ही नीतियों और कार्यक्रमों कि खिलाफत कर अपनी छवि चमका रहे है। गौर करने वाली बात है कि जबसे राहुल गांधी ने राजनीति में कदम रखा है तब से वह अपनी सुविधा के प्रश्न चुनते है और वह उसी पर बात करते है। असुविधा के सारे सवाल सरकार के हिस्से। तभी तो राहुल गाधी 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले, बढती मंहगाई, पेट्रोल – डीजल की कीमतों पर कोई बात नहीं करते, वह भोपाल त्रासदी पर भी कुछ नही कहते, कश्मीर हो अथवा परमाणु करार का मुद्दा सभी पर खामोश रहते है। अपनी सरकार के मंत्रीयों के भ्रषटाचार और राष्ट्रमंडल खेलों में मचे बवाल पर भी चुप रहते है और तो और वह आतंकवाद और नक्सलवाद के सवालों पर अपनी सरकार के नेताओं के द्वंद्व पर भी चुप्पी रखते है। यानि यह उनकी सुविधा है कि देश के किस प्रश्न पर अपनी राय रखें। इन सबके बावजूद वह देश के सामने मौजूद इन कठिन सवालों से बचकर चल रहे है। और इन सवालों को लेकर देश का युवा सङक पर उतर रहा है तो क्या गलत कर रहा है। यहां आम जनता के बारे में न कहकर युवाओं के बारें में इसलिए कह रहा हूं कि राहुल गांधी अपने को युवाओं का खैरख्वाह कहलाना पसंद करते है, और कांग्रेस उनको इन्ही देवत्व के गुणों से लैस करके सियासत के मैदान में उतारना चाहती है। लेकिन एक लोकतांत्रिक देश में जनता के बीच वहीं पूजा जाएगा जो जनता के दिलों का सम्राट बनेगा। और कांग्रेस को अपनी इस ब़ाजीगरी भरी नीतियों पर अभी इतराना शायद जल्दबाजी होगी।

शनिवार, 1 जनवरी 2011

क्या जेपीसी आम जनता के लिए नहीं ?

साल के शुरु से ही या फिर यूपीए – 2 के समय से ही खाने पीने की वस्तुओं की कीमत में जिस तरह से दिन – दूनी रात चौगुनी तरक्की हो रही थी वह अभी भी कहीं न कही से अपना मुंह खोल लेती है। अभी तक तो जनता ने दूध चीनी दाल सब्जी पेट्रोल सबके दाम देखे है अब इसमें एक नया सदस्य भी शामिल हो गया है प्याज, अब प्याज ने उछाल मारा तो इसमें नया क्या है। कृषि मंत्री शरद पवार के अनुसार प्याज की फसल बारिश से खराब हुई है। लेकिन सरकारी आंकङे को देखकर तो यह बात गले नहीं उतर रही है। आंकङे के अनुसार चालू वित्त वर्ष मे अक्टूबर तक 10.27 लाख टन प्याज का निर्यात किया गया। पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में निर्यात 12.99 लाख टन था। चालू वित्त वर्ष में अभी तक प्याज की पैदावार 95 लाख टन है, जबकि पिछले वर्ष 85 लाख टन थी। साफ है कि उत्पादन बढने और निर्यात कम होने के बावजूद प्याज की कीमतो पर और उसकी कालाबाजारी पर काबू नही पाया जा सका। इतना अर्थशास्त्र तो मैं जानता हूं कि जब उत्पादन बढने पर वस्तु का मूल्य घटता है। लेकिन यह पहली बार देखा है कि उत्पादन बढने पर भी वस्तु का मूल्य एक – दो रुपया नही बल्की तिगुणा बढ गया। यह किस तरह का अर्थशास्त्र है ये हमारे माननीय प्रधानमंत्री ही बताऐगें क्योकि वे तो अर्थशास्त्र के विद्वान कहलाते है। गौर करने वाली बात है अठ्ठारहवीं सदी के 80 के दशक में अस्तित्व मे आई कांग्रेस और उसका 83 वां महाधिवेशन, 80 के दशक में जन्मी भारतीय जनता पार्टी और प्याज का दाम 80 रुपये किलो तक जाना। दरअसल, इस 8 के आंकङे ने एक ऐसे खतरनाक चौकङी को खङा कर दिया है, जिससे आम आदमी को आने वाले सालों में राहत मिलने कोई उम्मीद नजर नहीं आती दिख रही है। दल्ली में आयोजित कांग्रेस की 83 वें महाधिवेशन में एक बहुत खतरनाक, जनविरोधी और राजतंत्रशाही समर्थित मानसिकता का खाका निकलकर आया। महाधिवेशन में पारित किए गए आर्थिक प्रस्ताव से साबित हो गया कि केन्द्र में सत्तारुढ कांग्रेस आखिर आम आदमी के बारे क्या सोचती है। इस प्रस्ताव पर मंच से सभी नेताओं ने एक ही बात कही कि हम यानी केन्द्र पैसा देता है, लेकिन राज्य उसका उपयोग नही करते। इस वित्तीय वर्ष में केन्द्र ने राज्यों को 2.83 लाख करोङ रुपये दिये जाने का लक्ष्य है, लेकिन राज्यों ने अभी तक 95 हजार करोङ रुरयो का उपयोग गरीबों के लिए लक्ष्यत योजनाओं में नही किया है।

गौरतलब है कि यह केन्द्र यानी कांग्रेस नीत सत्तारुढ यूपीए की मनसिकता है कि वह तो खैरात बांट रही है, लेकिन गरीबों यह राहत राज्य सरकारों के कारण नहीं मिल पा रहा है। इसलिए अगर आम आमदी को खैरात पूरी चाहिए तो राज्यों की सरकारों को कांग्रेस के शासन से बदल दे।

पार्टी के महाधिवेशन में एक और खतरनाक तर्क दिया गया। मौजूदा गृहमंत्री और पूर्व वित्तमंत्री पी. चिदंबरम ने यह तर्क रखा कि एनडीए के शासनकाल में औसत विकास दर 5.8 फीसदी थी, जबकी कांग्रेस नीत यूपीए में छह साल के शासनकाल में यह दर 8.5 फीसदी रही। चिदंबरम के अनुसार 3 फीसदी के अंतर के कारण ही केन्द्र की यूपीए सरकार ने किसानों का 70000 करोङ रुपय का ऋण माफ कर सकी। इसी तीन फीसदी के कारण 40000 करोङ रुपये की मनरेगा योजना चल सकी। प्रधानमंत्री ग्राम सङक योजना में 12000 करोङ रुपये रख सकी। सर्व शिक्षा अभियान, मिड – मिल में हजारों करोङों रुपये खर्च किए गए यानी विकास दर ज्यादा होगी तो गरीबों के उत्थान लिए काम किया जा सकेगा। नही तो नही। और विकास दर में बढोतरी वस्तुओं को मंहगा करके ही हो सकती है। लेकिन उन्होने और उनके साथियों ने यह नहीं बताया कि अगर सरकार ने अपना काम ढंग से करती तो 2जी स्पेक्ट्रम में ही उसे 1.76 लाख करोङ की आय होती, जो उस तीन फीसदी से कहीं ज्यादा है।

लेकिन हमारे प्रधानमंत्री ने यह एक बार नहीं कई बार कहा है कि वे मंहगाई जानबूझकर बढने दे रहै है। ऐसा नही किया तो देश की अर्थव्यवस्था ठप हो जाएगी, लोगों को रोजगार नहीं दिए जा सकेगें और गरीबों के उत्थान के लिए चलाई जा रही योजनाओं के लिए पैसा नही मिल सकेगा। प्रधानमंत्री ने यह बयान बीते बजट सत्र में राष्ट्रपति के अभिभाषण के दौरान दिया। साउदी अरब से लौटते हुए भी दिया और हाल ही में कनाडा में जी20 देशों के सम्मेलन के दौरान दिया। उनका कहना था कि देश के लोगों को संकीर्ण दायरे में रहकर नहीं सोचना चाहिए। लेकिन डेढ साल में सरकार की इस मंहगाई समर्थक नीति के कारण कितने लाख लोग काल के गाल में असमय ही समा गऐ। बीते एक साल में एक करोङ 36 लाख लोग गरीबी रेखा से नीचे चले गए है। यह हम नहीं यूएनडीईएसए की रिर्पोट कह रही है। इसका अंदाजा न सोनिया को है, न माननीय प्रधानमंत्री और न ही लालकृष्ण आडवाणी को।

यहां आडवाणीजी की बात इसलिए कर रहा हूं क्योकिं जून में जब पेट्रोल डीजल और रसोई गैस के दाम बढे तो राजग देशव्यापी बंद का आहवान किया था। बंद के तुरंत बाद आडवाणी जी के मुंह से हमेशा की तरह यही निकला कि बतौर विपक्ष हमने अपना कर्तव्य बखूबी निभाया और अब हम जनता के सामने अपना मुंहर लेकर जा सकेगें।

मंहगाई से आमआदमी पिछले डेढ साल से जूक्ष रहा है। लेकिन बतौर विपक्ष बीजेपी ने क्या किया। फरवरी 25 को संसद में धारा 193 के तहत बहस हुई, करीब आठ घंटे चली बहस के बाद अगले ही दिन वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने पेट्रोल डीजल और यूरिया के दाम बढा दिए। 27 अप्रैल को भाजपा औओर वामपंथीयो द्वारा सरकार के खिलाफ महंगाई पर कट मोशन लाया गया लेकिन ऐन मौके पर मुलायम, लालू, मायावती, शिबूसोरेन, अजीत सिंह, सब सरकार के साथ खङे दिखे।

जब जून में सरकार ने फिर से तेल रसोई गैस, केरोसिन के दाम बढाये तो जनता के मन का गुबार फुट पङा। नतीजतन 5 जुलाई को भारत बंद रहा यानी जब जनता सङक पर उतरी तो राजनीतिक दल बैकफुट पर आ गए। अगस्त में भाजपा द्वारा लाया जाने वाला स्थगन प्रस्ताव प्रणव मुखर्जी की एक चाय पार्टी के बाद संसद में एक आम बहस में तब्दील हो गया।

यहां पर बात यह उठती है कि विपक्ष तो 2जी स्पेक्ट्रम मामले में सरकार पर आंखे तरेती नजर आती है तो जेपीसी के मांग पर संसद का एक पूरा सत्र उसकी बलि चढा देती है, तो कभी महासंग्राम रैली करती दिखती है। लेकिन जब बात मंहगाई की आती है तो वह तत्परता विपक्ष में नहीं दिखता। मंहगाई के मामले में तो चाय की पार्टी में सुलह हो जाती है, लेकिन 2जी स्पेक्ट्रम मामले में हमारे वित्त मंत्री की चाय पार्टी काम न आई। इस मामले में तो भाजपा को माननीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की गर्दन दिख रही है।

सोमवार, 13 सितंबर 2010

समाजवादी या धनवादी

हमारे सांसदो ने अपने वेतन को बढाने के लिए जिस तरह दलगत भावना से उपर उठकर सदन के कार्यो को बधित किया। यह देखकर तो कहीं से ऐसा नहीं लग रहा था कि ये जनता के सेवक है। और अगर ये अपने को जनता के सेवक मानते है और संसद में इसलिए बैठे है कि जनता ने उन्हे वहां चुनकर भेजा है। तो जिस तरह ये अपने कर्मचारियों से तुलना कर अपनी तनख्वाह बढाने का तर्क दे रहे है बल्की बढा भी चुके है, तो उसी तरह से जनता की मांग है कि उसे भी उसके सेवक के बराबर सुविधा और वेतन उसे भी मिले। वह नौकरी में है या नही बिना इस बहस मे पङे उसे जनता होने और सरकार चुनने के इतने बङे काम के एवज में वेतन दिया जाना चाहिए। यहां जनता और सरकार आमने – सामने है। क्योंकि जनता और सरकार दो ऐसे सत्ता के केंन्द्र है जो वेतन नही मिलने पर भी अपनी जगह कायम रहने है। इनमें से एक ने जब अपना सारा ध्यान वेतन बढोतरी पर दिया है तो दूसरा सत्ता क्यों चुप रहें।

मामला तो दिलचस्प तब और हो जाता है जब इनके वेतन में मात्र तीन गुणा की बढोतरी होती है तो गरीब सांसदो के अगुवा बनकर उभरे समाजवादी नेता मुलायम सिह यादव ने बवाल खङा कर दिया। गौरतलब है कि संसदीय समिति ने सिफारिश की थी कि सांसदों का वेतन पांच गुणा बढना चाहिए तथा भारत सरकार के सचिव से एक रुपया ज्यादा हो क्योकि वरीयता क्रम में वे सचिव से उपर है। सांसद दलील देते है कि पूरे विश्व में वेतन सबसे कम है। उनका यह भी कहना है कि उन्हे बङे श्रेत्र की सेवा करनी पङती है और उनसे मिलने वालों में उनके श्रेत्र की जनता होती है। जिन्हे चाय पिलानी पङती है, बहुत भारी खर्च है उनपर, उनकी तनख्वाह में इजाफा तो होनी ही चाहिए। लेकिन इनका काम चाय पिलाना नहीं है । अपनी तमाम् जवाबदेहियों से मुँह मोङकर अगर उन्हे चाय पिलाने का इतना ही शौक है, तो अच्छा होगा की वे चाय की दुकान खोल ले।

आज भारतीय राजनीति पर कॉर्पोरेट संस्कति हावी हो गई है जो नेताओं की बङी कारों एवं डिजाइनर कपङों में देखी जा सकती है। 1975 में संविधान में संशोधन कर समाजवादी शब्द जोङा गया, किन्तु इनका समाजवाद की दिशा में बढने का कोई प्रयास कहीं से दिखता नहीं है। 1937 में जब नौ प्रांतो में कांग्रेस की सरकार बनी थी तो मंत्री ट्रेन की सबसे निचली – तृतीय श्रेणी यात्रा करते थे। और सांसद अपने को गरीब कहते है लेकिन उनकी संपत्ति की घोषणा से उनकी गरीबी का एहसास तो आम जनता को खूब होता है। यहां पर गौर करने वाली बात यह है कि जिस रफ्तार से उनकी संपत्ति बढती है यह देखकर कैसे मान लिया जाए की कम वेतन के कारण यह घाटे का धंधा है।

वेतन वृद्धि को लेकर सबसे मुखर लालू यादव थे। हजारों करोङ के चारा घोटाले को आरोपी है। बेहद गरीब परिवार से आते है। आज जो वैभव और संपत्ति उन्होने अर्जित किया है। वह इसी पेशे से किया है। और तो और कोई यह बता दे की कोई भी सांसद बनाने के बाद गरीब हुआ हो, उनकी संपत्ति तो दिन दुनी और रात चौगनी बढती है। गौरतलब है कि इनके वेतन बढने से कोई यह ना सोचे कि ये गलत तरीके से धन नहीं अर्जित करेंगे।

मंगलवार, 24 अगस्त 2010

इसे कहते है अंपायर

मैंदान वही , खिलाङी वही , विलेन कोई खिलाङी नही , वो तो अंपायर निकला।

मैं बात कर रहा हूं दांबुला मे खेला गये भारत श्रीलंका के बीच खेले गये मैच की। दांबुला के इस मैंच में कैप्टन कूल ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करने का फैसला किया। यह मैच श्रीलंका के हिसाब करो या मरो जैसा था क्योंकि अगर श्रीलंकाई टीम यह मैच हार जाती तो वह फाइनल से बाहर हो जाती। भारत के पास तो फिर भी अभी एक मौका है। लेकिन रविवार को जो भी हुआ उससे फिर एक बार सिंहलीयों पर खेल भावना के साथ खेलने पर उंगली उठने लगी है।

अभी भारत के साथ खेलते हुऐ पिछले मैच में सूरज रणदीव के द्वारा सहवाग को फेका गया नो बॉल विवाद थमा भी नही था कि श्रीलंकाई अंपायर धर्मसेना के द्वारा एक नया विवाद खङा कर दिया गया। धर्मसेना के द्वारा दिया गया फैसला कहीं न कहीं यह जरुर दर्शाता है कि वो अभी भी एक ईमानदार अंपायर कि भूमिका में नहीं है।

क्या धर्मसेना इस मैच में अंपायरिंग करने उतरे थे या फिर श्रीलंका के बारहवें खिलाङी के रुप में मैंदान पर आये थे। क्योंकि कही से यह लग ही नही रहा था कि वो अंपायरिंग कर रहे हो। रविवार के मैंच में उनकी अंपायरिंग देखकर तो ऐसा लग रहा था कि कहीं न कहीं उनके अन्दर अपनी टीम को फाइनल में पहुंचाने की ललक हो या फिर रणदीव – सहवाग विवाद का वो निकालना चाह रहे हो। खैर उनके दिमाग में कुछ भी चल रहा हो लेकिन इससे नुकसान किसे हो रहा है। गौरतलब है कि अगर बी.सी.सी.आई. आई.सी.सी से इस बारे में कुछ शिकायत करती है तो मैंच रिव्यू में जाऐगी। तो धर्मसेना को तलब भी किया जाऐगा हो सकता है कि अंपायर रेंटिग प्वांइट में उनके कुछ प्वांइट कट भी जाए। लेकिन इससे क्या उन्हे जो करना था वो तो कर गए। लेकिन इसका परिणाम क्या हुआ भारत इस सीरीज में भारत एक और शर्मनाक हार का स्वाद चखा। लेकिन इस पूरे विवाद ने एक सवाल जरुर खङा दिया है कि इससे नुकसान किसका हो रहा है। श्रीलंकाई टीम का नहीं मैंन – इन – ब्लू का नही। नुकसान तो हो रहा है इस जेन्टलमैन खेल का जिसे क्रिकेट कहते हैं।